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 सेवा, समर्पण और क्षेत्रीय दक्षता से निर्मित होगा सामाजिक कार्य का सशक्त भविष्य

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विजय कुमार  वाराणसी  

वाराणसी, 14 सितम्बर 2026। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अंतर्गत संचालित एम.ए. इन सोशल वर्क कार्यक्रम द्वारा प्रथम सेमेस्टर के विद्यार्थियों के लिए प्लेसमेंट, व्यावसायिक दक्षता एवं भविष्य की संभावनाओं पर एक विशेष संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया। सत्र के मुख्य वक्ता चिल्ड्रेन्स रिसर्च यूनिवर्सिटी, गुजरात के सहायक प्रोफेसर डॉ. शैलेश ब्रह्मभट्ट रहे। पाठ्यक्रम समन्वयक प्रो. वी. के. लहरी ने मुख्य वक्ता का स्वागत करते हुए विद्यार्थियों को प्लेसमेंट टीम की कार्यप्रणाली, उत्तरदायित्व और करियर-निर्माण में उसकी निर्णायक भूमिका से परिचित कराया।


 उन्होंने समाज-सेवा को भारतीय जीवन-दर्शन तथा “सेवा परमो धर्मः” के शाश्वत लोकाचार से जोड़ते हुए कहा कि जिस प्रकार दीपक को प्रकाशमान होने के लिए तेल और बाती—दोनों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार एक प्रामाणिक समाजसेवी के व्यक्तित्व में सहयोग और योगदान का जीवंत साहचर्य अनिवार्य है।



डॉ. शैलेश ब्रह्मभट्ट ने अपनी संघर्षपूर्ण जीवन-यात्रा एवं अनुभव साझा करते हुए विद्यार्थियों को कठिन परिस्थितियों में भी लक्ष्य के प्रति अडिग रहने का संदेश दिया। उन्होंने अपनी विश्वविद्यालय की प्रेरक संकल्पना “तेजस्वी बालक, तेजस्वी भारत” पर प्रकाश डालते हुए संस्थान की साझा विरासत तथा सामाजिक कार्य विभाग की कार्यप्रणाली से विद्यार्थियों को अवगत कराया। उन्होंने कहा कि सामाजिक कार्य के पाठ्यक्रम से जुड़ना गौरवपूर्ण अवसर है, क्योंकि इसकी आत्मा में सेवा, संवेदना, समर्पण और सामाजिक परिवर्तन निहित हैं। उन्होंने बताया कि राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटी, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO), क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम, ब्लड बैंक, मानसिक स्वास्थ्य एवं मनोरोग सेवाओं, बाल संरक्षण सोसायटी, आपदा प्रबंधन तथा विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों में प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए व्यापक रोजगार एवं नेतृत्व की संभावनाएँ उपलब्ध हैं।



श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” का उल्लेख करते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को कर्मनिष्ठा, आत्मविश्वास और निरंतर परिश्रम का संदेश दिया और स्पष्ट किया कि सामाजिक कार्य की व्यावसायिक दक्षता केवल पुस्तकीय ज्ञान से विकसित नहीं होती। इसके लिए कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकलकर समुदाय के बीच जाना, मानवीय समस्याओं को निकटता से समझना, संवाद स्थापित करना तथा नियमित क्षेत्रकार्य करना आवश्यक है।


डॉ. ब्रह्मभट्ट ने गुरु गोबिंद सिंह जी से संबद्ध प्रेरक उद्घोष—“सवा लाख से एक लड़ाऊँ, चिड़ियों से मैं बाज तड़ाऊँ, तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ”—के माध्यम से विद्यार्थियों को साहस, संकल्प और चुनौतियों पर विजय प्राप्त करने का संदेश देते हुए अपने वक्तव्य का समापन किया।


यह संवाद सत्र विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायी, ज्ञानवर्धक एवं भविष्यदर्शी सिद्ध हुआ तथा उन्हें सामाजिक कार्य के विस्तृत व्यावसायिक, शैक्षणिक और शोधपरक अवसरों से परिचित कराया। कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अशोक श्रीवास्तव ने किया।

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