आदिवासी कोरकू समाज में आज भी जीवंत है पारंपरिक संस्कृति
डुलार नृत्य बना आकर्षण, पारंपरिक वेशभूषा और लोकधुनों पर जमकर थिरके ग्रामीण
चिचोली/बैतूल। आदिवासी कोरकू समाज में आज भी अपनी प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं और लोक रीति-रिवाजों को जीवंत रखने का प्रयास निरंतर जारी है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से समाज के लोग अपनी लोक संस्कृति, परंपराओं और विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। इसी क्रम में ग्राम पिपलबर्रा में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में पारंपरिक डुलार नृत्य आकर्षण का केंद्र रहा।
कार्यक्रम के दौरान कोरकू समाज के लोगों ने पारंपरिक वेशभूषा धारण कर लोकधुनों और पारंपरिक गीत-संगीत की धुन पर सामूहिक रूप से डुलार नृत्य प्रस्तुत किया। नृत्य की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में मौजूद ग्रामीणों का ध्यान आकर्षित किया। पारंपरिक अंदाज में किए गए इस सामूहिक नृत्य में समाज की सांस्कृतिक विरासत और आपसी एकता की झलक देखने को मिली।
संस्कृति और परंपरा को सहेजने का प्रयास
डुलार नृत्य आदिवासी कोरकू समाज की लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सामाजिक आयोजनों और विशेष अवसरों पर पारंपरिक गीत-संगीत एवं नृत्य की प्रस्तुतियां की जाती हैं। बुजुर्गों के मार्गदर्शन में युवा भी इन परंपराओं को सीखकर आगे बढ़ा रहे हैं।
कार्यक्रम में मौजूद लोगों का कहना रहा कि आधुनिक दौर में नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और पारंपरिक संस्कृति से जोड़ना बेहद जरूरी है। ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों से बच्चों और युवाओं को अपनी लोक परंपराओं को करीब से समझने और उन्हें आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है।
ग्रामीणों की रही मौजूदगी
ग्राम पिपलबर्रा में आयोजित इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में राधे यादव, गोलू सुरजाहे, मोठु कास्दे, अनिश यादव, दयाराम यादव, डबल यादव, विनोद राठौर सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं समाज के लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक नृत्य और लोक संस्कृति को लेकर लोगों में उत्साह देखने को मिला।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह के आयोजनों को लगातार बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि कोरकू समाज की पारंपरिक कला, लोकगीत और नृत्य आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकें।
रिपोर्ट: दुर्गेश यादव, मध्यप्रदेश हेड
जन जन की आवाज़ न्यूज़ 24


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