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बाबा की सुरक्षा में तैनात जवानों की पीड़ा, परिजनों को दर्शन कराने में उठानी पड़ती है मुश्किल

अधिकारी हो या राजनेता, वीआईपी दर्शन कराने वालों से अपने ही रूठें

वाराणसी (काशीवार्ता)। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख श्री काशी विश्वनाथ धाम में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और सुगम दर्शन की जिम्मेदारी पुलिसकर्मियों के कंधों पर रहती है। गेट से लेकर गर्भगृह तक पुलिस जवान दिन-रात मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी निभाते हैं।


लेकिन इन जवानों की अपनी एक पीड़ा भी है। धाम में तैनात पुलिसकर्मियों के बीच यह चर्चा लंबे समय से बनी हुई है कि ड्यूटी के दौरान अपने परिजनों को दर्शन कराने में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जवानों का कहना है कि वे दूसरों को आसानी से दर्शन कराने की व्यवस्था में लगे रहते हैं, लेकिन जब उनके अपने माता-पिता या परिवार के सदस्य बाबा के दर्शन के लिए आते हैं तो उन्हें सामान्य कतार में ही खड़ा होना पड़ता है।


धाम में तैनात एक हेड कांस्टेबल ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हम कड़ी धूप में घंटों खड़े होकर श्रद्धालुओं को दर्शन कराते हैं। मेरी 70 वर्षीय मां गोरखपुर से पहली बार काशी आई थीं। इच्छा थी कि उन्हें बाबा विश्वनाथ का दर्शन करा सकूं, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया। मां घंटों लाइन में लगी रहीं और अंततः बिना दर्शन किए लौट गईं। ऐसी पीड़ा कई जवानों की है।"

जवानों का आरोप है कि एक ओर उन्हें आम श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है, वहीं दूसरी ओर प्रभावशाली लोगों के परिजनों को वीआईपी प्रोटोकॉल के तहत दर्शन की सुविधा मिल जाती है। जवानों के बीच इस व्यवस्था को लेकर असंतोष की भावना भी सामने आती रही है।

हालांकि इस मामले में डीसीपी सुरक्षा, ज्ञानवापी कमिश्नरेट वाराणसी अनिल कुमार यादव ने स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मियों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए नियम जरूरी हैं, लेकिन जवानों और उनके परिवारों को दर्शन को लेकर कोई दिक्कत नहीं होने दी जाएगी।

उन्होंने बताया कि सभी पुलिसकर्मी गेट नंबर-4 से अपना परिचय देकर अपने परिवार के सदस्यों को दर्शन करा सकते हैं। कमिश्नरेट का कर्मचारी हो या बाहर का कर्मचारी, सभी के लिए व्यवस्था उपलब्ध है। यदि किसी जवान को किसी प्रकार की परेशानी होती है तो वह सीधे अधिकारियों से संपर्क कर सकता है।

अब सवाल यह है कि जो जवान दिन-रात बाबा के धाम की सुरक्षा में खड़े रहकर लाखों श्रद्धालुओं को दर्शन कराने में अपनी भूमिका निभाते हैं, क्या उनके बुजुर्ग माता-पिता और परिवार के लिए भी सम्मानजनक एवं स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होनी चाहिए? डीसीपी के बयान के बाद जवानों को उम्मीद है कि उनकी इस पीड़ा का स्थायी समाधान हो सकेगा।

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विजय कुमार वाराणसी

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